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दारुल उलूम: आतंक नहीं, तालीम का गढ़

'भारत माता की जय' कहने या न कहने को लेकर विवाद तेज होता जा रहा है। दारुल उलूम के एक फतवे के बाद वीएचपी ने फतवा देने वालों और 'भारत माता की जय' न कहने वालों को आतंकवाद का समर्थक बता दिया। किसी ने देश छोड़कर जाने की बात कही तो किसी ने देशभक्ति पर सवाल उठाए...

नवभारत टाइम्स 10 Apr 2016, 8:52 am
नवभारतटाइम्स.कॉम why darul ulum is accused of having connection with terrorism
दारुल उलूम: आतंक नहीं, तालीम का गढ़


'भारत माता की जय' कहने या न कहने को लेकर विवाद तेज होता जा रहा है। दारुल उलूम के एक फतवे के बाद वीएचपी ने फतवा देने वालों और 'भारत माता की जय' न कहने वालों को आतंकवाद का समर्थक बता दिया। किसी ने देश छोड़कर जाने की बात कही तो किसी ने देशभक्ति पर सवाल उठाए। दारुल उलूम, देवबंद जाकर हमने जानने की कोशिश की कि क्या खास है इस संस्थान में और क्या है इसकी सोच। पेश है पूनम पाण्डे की एक रिपोर्ट :

मुजफ्फरनगर से करीब 20 किमी दूर देवबंद की मुख्य सड़क से दारुल उलूम (शिक्षा केंद्र) हम संकरी गलियों से गुजरते हुए पहुंचे। इस संस्थान की ज्यादा चर्चा, कम-से-कम मीडिया में तो किसी फतवे के कारण ही होती है। इस्लाम में सुन्नी मुसलमानों की दो विचारधारा प्रमुख रूप से प्रसिद्ध हैं, जिनमें एक देवबंदी और दूसरी बरेलवी विचारधारा है। देवबंदी विचारधारा का केंद्र दारुल उलूम देवबंद (सहारनपुर) है और बरेलवी विचारधारा का केंद्र बरेली है। बहरहाल, संस्थान के मेन गेट से अंदर एंट्री करते हुए हमें लगा नहीं था कि यह इतना बड़ा होगा। यह करीब 250 एकड़ में फैला होगा। करीब 4000 स्टूडेंट्स के रहने के लिए हॉस्टल, इतने ही स्टूडेंट्स के लिए अलग-अलग कोर्स की क्लास, एक बड़ी लाइब्रेरी और काफी खुला व हरा-भरा कैंपस। सुबह करीब 7:15 से 11:15 तक 4 क्लास चलने के बाद ब्रेक हो जाता है। स्टूडेंट्स, टीचर्स सब अपने घर या हॉस्टल चले जाते हैं। फिर 3 बजे से शाम 5 बजे तक 2 क्लास और लगती हैं। दारुल उलूम के पीआरओ अशरफ उस्मानी ने बताया कि दारुल उलूम एक मदरसा है। यह ऑटोनॉमस है। इसका अपना सेटअप, अपना सिलेबस है।

किस तरह की पढ़ाई
जब हम वहां पहुंचे तो ग्राउंड फ्लोर पर एक क्लास में स्टूडेंट्स कैलिग्रफी सीखते दिखे। अशरफ उस्मानी के मुताबिक, यहां पहली से पांचवीं क्लास तक लगभग वही पढ़ाया जाता है जो आमतौर पर सभी स्कूलों में पढ़ाया जाता है। पांचवीं तक हम बच्चों को मैथ्स, इंग्लिश, साइंस, सोशल साइंस, उर्दू, अरबी आदि सब सिखाते हैं और इसके साथ इस्लाम की फंडामेंटल चीजें जोड़ देते हैं। अगर हम अपने बच्चों को धार्मिक तालीम नहीं देंगे तो उन तक धर्म कैसे पहुंचेगा? बेशक बच्चों को यहां मुख्य रूप से धर्म की तालीम दी जाती है। पांचवीं के बाद दरसे निजामी (एक तरह का कोर्स) पढ़ाया जाता है। अगर यहां किसी ने अरबी की पहली क्लास में दाखिला लिया है तो उसे पढ़ाई मुकम्मल करने में 8 साल लगते हैं। 8 साल में वह आलिम (ग्रैजुएट) बनकर निकलता है। यानी इतने साल की पढ़ाई के बाद वह मौलाना या मौलवी हो जाता है। हमारी डिग्री है ख्वाजिल-ए-दारुल उलूम, यानी दारुल उलूम से ग्रैजुएट। मुफ्ती बनने के लि फतवा का कोर्स करना जरूरी है। दूसरी यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन करने के बाद भी स्टूडेंट्स यहां पढ़ने आते हैं। इनके अलावा, अडिशनल कोर्स भी हैं। हम कंप्यूटर कोर्स, मास कम्यूनिकेशन, टेलरिंग आदि भी सिखाते हैं। यहां सिर्फ लड़के पढ़ते हैं। सवाल है कि क्या मजहब की पढ़ाई करने से रोजगार मिल पाता है? इस पर उस्मानी ने पलटकर सवाल किया, 'क्या किसी मौलवी, किसी मुफ्ती को कभी बेरोजगार देखा है?' 0.01 पर्सेंट भी बेरोजगारी नहीं है। हिंदुस्तान में हजारों-लाखों ग्रैजुएट, पोस्ट ग्रैजुएट, इंजीनियर बेरोजगार मिल जाएंगे, लेकिन कोई मौलवी-मुफ्ती बेरोजगार नहीं मिलेगा। हम बच्चों को हकीकत बताते हैं कि जरूरत के मुताबिक कमाएं, जरूरत के मुताबिक खाएं। न ज्यादा, न कम खर्च करें।' लेकिन देश के विकास के लिए तो दूसरे कोर्स भी चाहिए? जवाब मिला कि उसके लिए हिंदुस्तान में ढेरों इंस्टिट्यूट हैं। उस्मानी ने बताया कि यह हमारी स्पेशलिटी है। आप आईआईटी से इतिहास पढ़ाने को तो नहीं कहेंगे। वह उसकी स्पेशलिटी है, यह हमारी है। यहां से हर साल करीब 900 आलिम (ग्रैजुएट) पासआउट होते हैं। हमारे यहां एंट्रेस टेस्ट बहुत मुश्किल होता है। पहले तो मलयेशिया, इंग्लैड, अमेरिका, साउथ अफ्रीका, इंडोनेशिया जैसे देशों से भी स्टूडेंट्स आते थे, लेकिन एजुकेशन वीजा पर सरकार के बैन लगाने के बाद अब वे नहीं आ पाते। यह हमारे साथ भेदभाव है। जब हम फर्स्ट फ्लोर पर पहुंचे तो वहां एक बड़ी लाइब्रेरी दिखी। हजारों-लाखों किताबें हैं यहां, जिनमें अंग्रेजी, उर्दू, फारसी की कई दुर्लभ किताबें भी हैं। आम लाइब्रेरी की तरह यहां कुर्सी-टेबल नहीं हैं, बल्कि जमीन पर ही बैठने का बेहद खूबसूरत इंतजाम है। कैंपस में कुछ स्टूडेंट्स पढ़ते दिखे तो कुछ लोग घूमते। उस्मानी ने बताया कि यहां देश के अलग-अलग कोने से हर रोज सैकड़ों लोग घूमने भी आते हैं। तमाम महिलाएं भी यहां दिखीं।

कैसे चलता है दारुल उलूम
बात करते-करते हम उस कमरे तक पहुंचे, जहां से इस संस्थान को चलाने के लिए फंड का इंतजाम होता है और सारा हिसाब-किताब देखा जाता है। यहां भी जमीन पर ही बैठने का इंतजाम है। छोटी-छोटी टेबलों पर कुछ मौलवी काम करते दिखे। बताया गया कि यहां पढ़ाई पूरी तरह फ्री है और रहने-खाने का इंतजाम भी। यह डोनेशन से चलता है, लेकिन अमीरों और सरकार से डोनेशन नहीं लेते। उस्मानी ने कहा कि यहां के अलुमिनाई दुनिया के हर कोने में हैं। कहीं भी चले जाएं, वहां दारुल उलूम से पढ़ा हुआ या यहां से निकले स्टूडेंट्स का शागिर्द जरूर मिलेगा। उन्होंने कहा कि हमने मीडिया को बैन किया हुआ है। हम मीडिया को अंदर आने की इजाजत नहीं देते। हम कुछ छिपाना नहीं चाहते। दरअसल इससे पढ़ाई में बाधा पड़ती है। कुछ अरसा पहले जर्मनी से एक जर्नलिस्ट आईं। वह हमसे पहले बात करके नहीं आई थीं इसलिए हमने बातचीत से मना कर दिया। लेकिन उन्होंने बताया कि वह दारुल उलूम के लिए ही जर्मनी से यहां आई हैं। वह आईएस के खिलाफ स्टेटमेंट मांग रही थीं। उनका तर्क था कि जर्मनी में जितने मुस्लिम रहते हैं, वे सिर्फ और सिर्फ देवबंद को फॉलो करते हैं इसलिए वह इतनी दूर से बयान लेने आई हैं। फिर हमने उन्हें बयान दिया।

देश बंटवारे का विरोध
आगे बढ़ते-बढ़ते हमने देवबंद का इतिहास जानना चाहा और पूछा कि मुल्क के लिए इस संस्था का क्या योगदान है? दारुल उलूम के मोहतमिम यानी वीसी मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने बताया कि दारुल उलूम, देवबंद 1866 में उस वक्त अस्तित्व में आया था, जब हिंदुस्तान में अंग्रेजी हुकूमत थी। इसके फाउंडर 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ एक जंग हार चुके थे। इसकी स्थापना इस इरादे से हुई थी कि देश की आजादी के लिए अगर हमें लड़ना है तो पहले लोगों को एकजुट करना होगा, उन्हें शिक्षित करना होगा। दारुल उलूम ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला और अपने मकसद में कामयाब रहा। इस संस्था ने हिंदुस्तान के मुसलमानों को बताया है कि यह मुल्क तुम्हारा अपना है। इस पर तुम्हारा भी दूसरों जितना ही हक है। कांग्रेस ने एक वक्त में देश की आंशिक आजादी कुबूल कर ली थी, लेकिन 1915 में देवबंद ने कहा कि हमें पूरी आजादी चाहिए। जिस वक्त मोहम्मद अली जिन्ना ने 'टू नेशन थियरी' दी, उस वक्त देवबंद ने ही उसका विरोध करते हुए कहा था कि मजहब की बुनियाद पर मुल्क नहीं बनता। हमने बंटवारे का विरोध किया। बंटवारे के वक्त हमने बहुत-से मुसलमानों को यहीं रहने के लिए तैयार किया। हम बिना हुकूमत देखे राष्ट्रीय मसलों के पक्ष में आवाज उठाते हैं।

मदरसा और आतंकवाद
तमाम लोग मदरसों को आतंकियों का गढ़ कहते हैं, यह पूछने पर मौलाना नौमानी ने कहा, 'हम साफ-सुथरी सोच रखते हैं। हम इस बात को अच्छे-से जानते हैं कि जो लोग आज हमारा विरोध कर रहे हैं, वे अंग्रेजों की मुखबिरी किया करते थे। उन्होंने हमें कभी भी मुख्यधारा में कबूल ही नहीं किया। उन्होंने न हमें कल पसंद किया था, न आज कर रहे हैं और न कल करेंगे इसलिए हमें उनकी फिक्र नहीं है। हालांकि उसमें कोई एक कौम शामिल नहीं है। हमारे अपने मजहब के लोग भी हैं। हम इतना जानते हैं कि गलती इंसान से होती है और हो सकता है कि हमसे भी किसी जगह हो गई हो, लेकिन अभी तक ऐसी चीज हमारे सामने आई नहीं कि हमें माफी मांगनी पड़े। हम सोच-समझकर काम करते हैं। चर्चा में रहने का हमें शौक नहीं है।' उस्मानी ने कहा कि मजहब से आतंकवाद को नहीं जोड़ना चाहिए। अगर मुस्लिम आतंकवाद की बात करते हैं तो भगवा आतंकवाद की भी बात करनी होगी। यह भेदभाव है कि आप भगवा आतंकवाद को आतंकवाद ही न मानें! बहुत जगहों पर फौजी जवान, पुलिसवाले मार दिए जाते हैं। क्या यह आतंकवाद नहीं है? उन्हें मारनेवालों को कोई आतंकवादी क्यों नहीं कहता? आप किसकी तरफ इशारा कर रहे हैं, यह पूछने पर उस्मानी ने कहा कि क्यों नाम लूं किसी का? वीरप्पन ने कितने पुलिसवाले मारे, क्या किसी ने आतंकवादी कहा उसे? क्यों नहीं कहा? किसे कहते हैं आतंक? खौफ फैलाने वाला हर कोई आतंकवादी है। हिंदुस्तान में आजादी से लेकर अब तक 25 हजार से ज्यादा फसाद हो चुके हैं, जिनमें हजारों मुसलमान मारे जा चुके हैं। क्या यह आतंकवाद नहीं है? पुलिसवाले बेगुनाह मुसलमानों को आतंकवादी कहकर बंद कर देते हैं, तमाम जिंदगियां तबाह हो जाती हैं। क्या ऐसा करने वाले आतंकवादी नहीं हैं? असल में पहले आतंक की परिभाषा को साफ करने की जरूरत है।

देशप्रेम को हां, वंदे मातरम् को ना
'घर वापसी' और 'लव जिहाद' के बारे में वीसी और पीआरओ, दोनों ने बोलने से इनकार कर दिया और कहा कि ये अब राजनीतिक विषय हो गए हैं इसलिए हम इनके बारे में कुछ न बोलेंगे। इस दौरान हमने जब बाहर टहल रहे कुछ स्टूडेंट्स का फोटो लेना चाहा तो वे वहां से हट गए। हमें बताया गया कि इस्लाम में फोटो खींचना और खिंचवाना मना है, लेकिन जब पासपोर्ट के लिए फोटो जरूरी हुई तो इसकी इजाजत दी गई। जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, दारुल उलूम कैंपस में तिरंगा ढूंढने की कोशिश करने लगे। जब उनसे पूछा कि क्या तिरंगा फहराते हैं तो वीसी ने गर्मजोशी से जवाब दिया, 'हां, 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा फहराते हैं और राष्ट्रगान भी गाते हैं।' तो फिर 'भारत माता की जय' को लेकर विवाद क्यों? जवाब मिला कि भारत माता को दुर्गा के रूप में दिखाया जा रहा है और इस्लाम में मूर्ति पूजा नहीं होती इसलिए 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' से हमें ऐतराज है। उन्होंने फतवा भी जारी किया था कि भारत माता की जय कहना गैरइस्लामिक है। यह पूछने पर कि देशप्रेम दिखाने के लिए क्या नारे लगा सकते हैं? वीसी ने जोर से कहा: हिंदुस्तान जिंदाबाद, जय भारत, मादरे वतन जिंदाबाद। लेकिन वंदे मातरम्... यानी वंदना एक तरह से पूजा है। इस्लाम में कुछ भी पूजनीय नहीं है... मां भी नहीं।

फतवे का फंडा
दारुल उलूम के अंदर फतवे के लिए एक अलग डिपार्टमेंट है। यहां 8 मुफ्ती हैं। वैसे तो देश के हर शहर में मुफ्ती हैं, जो फतवा जारी करते हैं, लेकिन फाइनल अथॉरिटी दारुल उलूम को माना जाता है। करीब 2 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फतवे की कोई कानूनी मान्यता नहीं है। हमने पूछा तो फिर फतवा क्यों जारी करते हैं? मौलाना नौमानी ने कहा कि यह इस्लामिक एक्सपर्ट की राय है। फतवा बताता है कि इस्लाम में क्या चीज जायज है, क्या नाजायज। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा। कोर्ट ने हमसे पूछा था कि फतवे की क्या परिभाषा है? हमने जवाब दे दिया था। हिंदुस्तान में कानून का राज है। यहां हम इस्लामिक हुकूमत लागू नहीं कर सकते। हम सिर्फ उसी बारे में फतवा दे सकते हैं जिसकी संविधान ने हमें इजाजत दी हुई है। मसलन संविधान ने हमें अपने मजहब की रक्षा करने की इजाजत दी है। हम उसकी रक्षा करेंगे। हम चाहेंगे कि फतवा को माना जाए, लेकिन मानना या न मानना लोगों का अधिकार है। हमारे पास कोई पावर तो है नहीं कि हम उसे जबरन लागू कराएं। फतवा एक शरियाई राय है। मुफ्ती बताता है कि कुरान-हदीद यह कहता है। यह मुफ्ती की अपनी राय भी नहीं होती। फतवा सिर्फ मुफ्ती दे सकता है, जिसने कोर्स कर रखा है और जो प्रैक्टिस भी करता हो। क्या आईएस के खिलाफ फतवा दिया? यह पूछने पर वीसी ने कहा कि हमने साल 2011 में ही दहशतगर्दी के खिलाफ फतवा जारी कर दिया था। उसमें सिर्फ किसी एक मुल्क के दहशतगर्द नहीं थे, सभी आ गए थे। बेगुनाहों का कत्ल करना सबसे बड़ा गुनाह है। काबा को ढहाने से भी बड़ा गुनाह है बेगुनाह की जान लेना।

भारत माता की जय और विवाद
उस्मानी ने कहा कि हिंदू माइथॉलजी में भी शायद ऐसा नहीं है कि जमीन को मां बनाकर पेश किया गया हो। इस तरह के कॉन्सेप्ट 1857 में बनाए गए। उससे पहले ऐसा कुछ नहीं था। हम खुदा के अलावा किसी की पूजा नहीं करते, लेकिन वतन से मोहब्बत करना हम अपना मजहबी दायित्व समझते हैं। वतन से मोहब्बत आधा ईमान है और बाकी सारे ईमान मिलाकर आधे। वतन से मोहब्बत को बहुत अहमियत दी गई है, लेकिन कोई कहे कि इसे दुर्गा के रूप में पूज लो तो हम नहीं पूज सकते। तो क्या लगता है कि भारत माता की बात पर राजनीति हो रही है? वीसी ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से ऐसा महसूस होने लगा है कि कुछ गलत लोग इसे गलत अंदाज में पेश कर रहे हैं। मैं किसी खास सियासी पार्टी की तरफ इशारा नहीं कर रहा, बल्कि पूरा सियासी माहौल इसका गुनहगार है। कोई बात होती है, कहीं बहस होती है तो मुसलमान से पूछते हैं। आर्यसमाजी, सिखों, ईसाइयों पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता? आर्यसमाजी भारत माता (दुर्गा) को नहीं पूजते, सिख नहीं पूजते, ईसाई नहीं पूजते, जैन नहीं पूजते, लेकिन उनसे कोई सवाल नहीं करता। इनसे पूछा जाए कि वे देशभक्त हैं या नहीं? अशरफ उस्मानी ने कहा कि जो हमारे देशप्रेम पर सवालिया निशान लगाते हैं, उन पर हमें तरस आता है। हमें किसी को साबित नहीं करना कि हम देशप्रेमी हैं। हमें किसी से सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

महिलाओं की स्थिति खराब क्यों?
दारुल उलूम के आसपास बुर्का पहने हुए कई महिलाएं दिखीं। हमने पूछा कि क्या महिलाओं की स्थिति इस्लाम में ज्यादा खराब नहीं है? इस पर उस्मानी बोले कि मजहब और समाज, दोनों चीजों को देखें। हमारा मजहब तो कहता है कि आप अपनी बेटी को खेती की जमीन में भी हिस्सा देंगे। इस्लाम जो हक देने को कहता है, अगर कोई नहीं देता तो वह खता समाज की है, मजहब की नहीं। यह समाज की कमी है कि औरत की स्थिति खराब है। दुनिया के जिन मुल्कों में इस्लाम का कानून चल रहा है वहां औरतों की स्थिति अच्छी है। हमारे देश में आज भी भ्रूणहत्या होती है और लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। इस्लाम इसे गुनाह मानता है। लेकिन पति के एक से ज्यादा शादी करने से क्या महिलाओं की स्थिति खराब नहीं होती? उस्मानी ने कहा कि कुरान ने जो शर्तें लगाई हैं, अगर उन तमाम शर्तों को देखा जाए तो कोई आसानी से दूसरी शादी नहीं कर सकता। लेकिन यह भी सच है कि इजाजत है तो इसे रोका भी नहीं जा सकता। ऐसे में सभी बीवियों के साथ इंसाफ होना चाहिए। बराबर तवज्जो देनी चाहिए। बात आगे बढ़ी तो हमने पूछा कि क्या वक्त के साथ मजहबी पाबंदियों को बदलना नहीं चाहिए? इस पर उन्होंने कहा कि हमें नहीं लगता कि किसी चीज को बदलने की जरूरत है। लेकिन वक्त के साथ तो संविधान तक में बदलाव होते हैं? सामने से जवाब आया: संविधान इंसानों का बनाया हुआ है, लेकिन हमारा यकीन है कि कुरान आसमानी है।

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