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George Fernandes : 'भगवान नहीं हरा सकते, आप हरा सकते हैं'

कर्नाटक के मैंग्लोरिन कैथोलिक परिवार में जन्मे जॉर्ज फर्नांडिस मुंबई होते हुए मुजफ्फरपुर पहुंचे और फिर यहीं का होकर रह गए। 29 जनवरी 2019 को उनका निधन हुआ। बिहार के लोगों में जॉर्ज साहब के प्रति काफी सम्मान है।

नवभारतटाइम्स.कॉम 29 Jan 2021, 6:44 pm

हाइलाइट्स

  • मुजफ्फरपुर से 5 बार सांसद चुने गए जॉर्ज फर्नांडिस
  • सिटी पार्क में मनाई गई जॉर्ज फर्नांडिस की पुण्यतिथि
  • जॉर्ज साहब ने मुजफ्फरपुर को बनाई थी कर्मभूमि
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नवभारतटाइम्स.कॉम george fernandis
के विक्रमराव, वरिष्ठ पत्रकार
1967 की बात है। लोकसभा के चुनाव होने वाले थे। मैं उस वक्त मुंबई में था। वहां कांग्रेस के एक बेहद कद्दावर नेता हुआ करते थे एसके पाटिल। उन्हें मुंबई का बेताज बादशाह कहा जाता था। वह जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी सरकार में लगातार मंत्री हो रहे थे और दक्षिण मुंबई सीट से लगातार तीन बार से सांसद हो रहे थे। उन्हें हरा पाना नामुमकिन माना जाता था। उस वक्त जॉर्ज फर्नांडीज मुंबई के पार्षद हुआ करते थे।
अखबारों में लिखा गया 'जायंट किलर'
उनके एसके पाटिल के मुकाबिल चुनाव लड़ने की चर्चा थी। वैसे किसी को यकीन नहीं था कि चुनाव में कोई बड़ा उलटफेर होगा। चुनाव से पहले एक रोज एसके पाटिल की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। इधर-उधर के तमाम सवालों के बीच मैंने उनसे सवाल कर लिया कि क्या इस बार भी आप दक्षिण मुंबई से चुनाव लड़ेंगे? उन्होंने बहुत अचरज के साथ मुझे देखा, फिर बोले- क्यों, वहां से नहीं लड़ूंगा तो फिर कहां से लड़ूंगा? मैंने कहा- सुना है कि उस सीट पर जॉर्ज भी चुनाव लड़ रहे हैं। एसके पाटिल की नाक-भौंह सिकुड़ गई। फिर उन्होंने मुझसे ही सवाल दाग दिया- कौन जॉर्ज, वही पार्षद? मैंने कहा, हां, वही पार्षद लेकिन आप तो महाबली हैं। आपको तो कोई महाबली ही हरा सकता है। एसके पाटिल का जवाब था, ‘महाबली छोड़िए, मुझे भगवान भी नहीं हरा सकते हैं।’

अगले दिन सभी अखबारों की यही हेडलाइन थी- मुझे भगवान भी नहीं हरा सकते हैं: एसके पाटिल। बस फिर क्या था, जॉर्ज को यहीं से अपने चुनाव अभियान का सूत्र वाक्य मिल गया। जॉर्ज के जो पोस्टर निकले, उनकी टैग लाइन थी- ‘उन्हें भगवान नहीं हरा सकते हैं लेकिन आप उन्हें हरा सकते हैं।’ इसके जरिए जॉर्ज ने उस चुनाव को पाटिल बनाम आमजन का बना दिया। चुनाव नतीजा आया तो वह हैरान कर देने वाला था। 37 साल के जॉर्ज ने एसके पाटिल को हराकर राजनीतिक गलियारों में सनसनी मचा दी। उन्हें उस वक्त अखबारों में ‘जायंट किलर’ लिखा गया था।

ऐसे गिरफ्तार हुए थे जॉर्ज फर्नांडिस
यह इमरजेंसी का दौर था। बड़ौदा डायनामाइट केस में जॉर्ज की बहुत सरगर्मी से तलाश हो रही थी। जॉर्ज पहले कुछ दिन बड़ौदा स्थित हमारे आवास में रुके। उसके बाद दिल्ली से होते हुए कोलकता पहुंचे, जहां एक चर्च में पनाह पाई। कभी बंगलौर में पादरी का प्रशिक्षण ठुकराने वाले और धर्म को बकवास कहने वाले जॉर्ज को अपने मित्र रूडोल्फ रॉड्रिक्स की मदद से चर्च में पनाह मिली थी, जो वहां के पादरी थे। उन्होंने अपने एक अतिथि के रूप में जॉर्ज को शरण दी और यह किसी को नहीं बताया कि यह जॉर्ज है। उधर पुलिस और सीबीआई जॉर्ज को तलाशने में एक-एक शहर में छापेमारी कर रही थी। पुलिस चर्च तक पहुंच गई। पूछताछ में रॉड्रिक्स ने पुलिस को बताया कि कमरे में उनका ईसाई अतिथि रह रहा है। पुलिस को कमरे की तलाशी के दौरान एक छोटे से बक्से में एक रेलवे कार्ड मिला। वह ऑल-इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष का प्रथम एसी वाला कार्डपास था। नाम लिखा था जॉर्ज फर्नांडीज।

बस पुलिस टीम उछल पड़ी, मानो लॉटरी खुल गई हो। तुरंत प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क साधा गया, पूछा गया कि बेशकीमती कैदी का क्या किया जाए? उस रात जॉर्ज को गुपचुप फौजी जहाज से दिल्ली ले जाया गया। इंदिरा गांधी तब मास्को के दौरे पर थीं। उनसे फोन पर निर्देश लेने में समय लगा। इस बीच पादरी ने ब्रिटिश और जर्मन उपराजदूतावास को बता दिया कि जॉर्ज गिरफ्तार हो गए है। खबर लंदन और बर्लिन पहुंची। उस वक्त के इन देशों का जो राजनीतिक नेतृत्व था, उसने भारत की प्रधानमंत्री से संपर्क किया और कहा कि जॉर्ज का एनकाउंटर नहीं होना चाहिए क्योंकि इस बात की आशंका ज्यादा थी कि पुलिस जॉर्ज को एनकाउंटर में मार देगी और लाश भी ठिकाने लगा देगी और उन्हें फरार भी मानती रहेगी। अंतरराष्ट्रीय दबाव में जॉर्ज की गिरफ्तारी को घोषित किया गया और उन्हें तिहाड़ जेल लाया, जहां मैं इस केस में पहले से ही बंद चल रहा था।

तिहाड़ जेल में मानस पाठ
डायनामाइट केस में जॉर्ज और हम सब तिहाड़ जेल में बंद थे। जॉर्ज अभियुक्त नंबर एक थे और मैं अभियुक्त नंबर दो। यह अक्टूबर 1976 था। दशहरा का पर्व आया। तय हुआ कि अखंड मानस पाठ किया जाए। मानस की प्रतियां भी आ गईं। आसन साधा गया। पूर्वी रेल यूनियन के नेता महेंद्र नारायण वाजपेयी ने संचालन संभाला। मुश्किल आई कि हम हिंदूजन केवल आधे-पौन घंटे की क्षमतावाले थे। कमसे कम दो तीन घंटे का माद्दा केवल जॉर्ज में था। आखिर श्रमिक रैली, चुनावी सभाओं और लोकसभा में भाषण की आदत तो थी ही। तय हुआ कि जॉर्ज को पाठ के लिए चौबीस में से बारह घंटे चार दौर में आवंटित किए जाएं। शेष हम बारह लोग एक एक घंटे तक दो भाग में पाठ करेंगे। ऐसा हुआ भी।

समाजवादी हो और आतिशी न हो, यह मुमकिन ही नहीं। यही तो उनकी फितरत होती है। जॉर्ज ने रक्षामंत्री के आवास (तीन कृष्ण मेनन मार्ग) में बर्मा के विद्रोहियों का दफ्तर खोल दिया था। ये लोग फौजी तानाशाही के विरुद्ध मोर्चा खोले थे। वह तिब्बत में दलाई लामा की वापसी का समर्थन तो करते ही रहे, उनके बागियों की धन-मन से मदद भी करते रहे। अंडमान के समीप भारतीय नौसेना ने शस्त्रों से लदे जहाज पकड़े जो अराकान पर्वत के मुस्लिम पीड़ितों के लिए लाए जा रहे थे। जॉर्ज ने जलसेना कमांडर को आदेश दिया कि ये जहाज रोके न जाएं। सच्चा समाजवादी दुनिया के हर कोने में हो रहे प्रत्येक विप्लव, विद्रोह, क्रांति, उथलपुथल, संघर्ष, बगावत और गदर का समर्थक होता है क्योंकि उससे व्यवस्था बदलती है, सुधरती है। जॉर्ज सदा बदलाव के पक्षधर रहे। इसलिए आज भी आम जन के वे मनपसंद राजनेता हैं।

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