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64th BPSC के रिजल्ट में जनरल और OBC कैटेगरी का कटऑफ मॉर्क्स बराबर, एक्सपर्ट्स से समझें इसके मायने

BPSC 64th Exam Final Result : बीपीएससी की 64वीं परीक्षा के रिजल्ट का कटऑफ गौर करने वाला है। इस बार सामान्य श्रेणी और ओबीसी कैटेगरी का कटऑफ मार्क्स बराबर है। आरक्षण के विरोध के बीच BPSC का इस बार का कटऑफ एक नए किस्म की बहस को जन्म देता दिख रहा है। समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्री से BPSC के कटऑफ के मायने और समाज के युवा वर्ग के बीच जाने वाले संदेश को समझने की कोशिश की।

Authored byAbhishek Kumar | नवभारतटाइम्स.कॉम 8 Jun 2021, 10:43 pm

हाइलाइट्स

  • BPSC रिजल्ट में जनरल और ओबीसी का कटऑफ मार्क्स बराबर
  • बीएसएससी टॉप 10 में ज्यादातर इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के अभ्यर्थी
  • कटऑफ से सामाजिक परिवर्तन का अनुमान गलत- समाजशास्त्री
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नवभारतटाइम्स.कॉम BPSC
पटना
बिहार लोक सेवा आयोग (Bihar Public Service Commission) की ओर से बीपीएससी 64वीं परीक्षा का रिजल्‍ट (BPSC Result) जारी हुए दो दिन हो गए हैं। इन दो दिनों में राज्यभर से बीपीएससी की परीक्षा उतीर्ण करने वाले कैंडिडेट की खबरें आ रही हैं। इस बार टॉप 10 में ज्यादातर इंजीनियरिंग के छात्र हैं। यहां तक की आईआईटी से पासआउट छात्र भी लोकसेवा की परीक्षा पास कर प्रशासन के क्षेत्र में आएंगे। आयोग से मिली जानकारी के अनुसार सामान्य वर्ग के लिए कट ऑफ मार्क्स 535, सामान्य महिला के लिए 513, एससी 490, एससी महिला 490, एसटी 514, एससी महिला 513, ईबीसी 516, ईबीसी महिला 495, पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) 535, पिछड़ा महिला 511 कटऑफ मार्क्स पर सफल हुए।
बीपीएससी की 64वीं परीक्षा के रिजल्ट का कटऑफ गौर करने वाला है। इस बार सामान्य श्रेणी और ओबीसी कैटेगरी का कटऑफ मार्क्स बराबर है। इतना ही नहीं अनुसूचित जाति और जनजाति कैटेगरी का कटऑफ भी जनरल से ज्यादा पीछे नहीं है। पूरे भारत में समय-समय पर नौकरियों में आरक्षण का विरोध होता रहा है। आरक्षण के विरोध के बीच BPSC का इस बार का कटऑफ एक नए किस्म की बहस को जन्म देता दिख रहा है। नवभारत टाइम्स.कॉम ने समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्री से BPSC के कटऑफ के मायने और समाज के युवा वर्ग के बीच जाने वाले संदेश को समझने की कोशिश की।

कटऑफ का अंतर कम होना किसी और रूप में लेने की जरूरत नहीं: एस नारायण
समाजशास्त्री और अनुसूचित संख्यात्मक जनजाति आयोग के सदस्य एस नारायण ने कहा कि देश में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा और अतिपिछड़ा वर्ग के लोगों को पढ़ाई और नौकरी में मदद देने का प्रावधान है। सरकार चाहे जो भी हो वह संविधान के तहत उन्हें टैक्स के पैसों से विशेष सुविधा देती हैं। यह सुविधा किसी विशेष राज्य या सरकार का मसला नहीं है। यह किसी भी सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। जहां तक BPSC में आरक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों और सामान्य श्रेणी के छात्रों के कटऑफ में अंतर कम होने का सवाल है तो इसे किसी और रूप में लेने की जरूरत नहीं है। नौकरियों के लिए होने वाली परीक्षा के लिए केंद्र या राज्य सरकार की संस्था का एक पैटर्न होता है। जिसमें पहले से ही समाज के हर वर्ग के लोगों का ख्याल रखते हुए सीटें तय की जाती हैं। इसमें ये भी ख्याल रखा जाता है कि इंटरव्यू के दौरान भी किसी किस्म का भेदभाव ना हो। यह पूरी प्रक्रिया संवैधानिक होती है। इसलिए कटऑफ मार्क्स में अंतर कम होने की बात को किसी और रूप में लेने की जरूरत नहीं है।

कटऑफ देखकर बिहार के शिक्षा के स्तर का अनुमान लगाना गलत: मंजू सिन्हा
पटना के आरपीएस कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग की लेक्चरर मंजू सिन्हा ने कहा कि ना केवल बिहार बल्कि पूरे देश में सामाजिक परिवर्तन हो रहा है। बीपीएससी के कटऑफ को देखकर यह कतई नहीं कहा जा सकता है कि बिहार में शिक्षा का स्तर दूसरे राज्यों की तुलना में अच्छा है। हां ये बात जरूर है कि बदलते वक्त के साथ समाज में जागृति आने के बाद समाज के हर जाति के लोग अब शिक्षा को तवज्जो दे रहे हैं। यहां एक बात और ध्यान देने की है कि आरक्षित कैटेगरी में BPSC की परीक्षा उतीर्ण करने वाले अधिकतम छात्रों के परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है। क्योंकि अगर आरक्षित वर्ग में उतीर्ण हुए छात्र को कंपटीशन की तैयारी के लिए तमाम सुविधाएं परिवार से मिली हैं तो वह अलग अध्ययन का विषय हो जाता है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि आरक्षण का लाभ समाज के हर जाति वर्ग के उन लोगों को मिलना चाहिए जिन्हें खुद को आगे करने के लिए पर्याप्त सहूलियत नहीं मिल पा रही है।


कटऑफ से किसी सामाजिक परिवर्तन का अनुमान गलत: विनोद कुमार चौधरी
सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन एवं समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष पद से रिटायर प्रोफेसर विनोद कुमार चौधरी ने कहा कि छात्र-छात्राएं चाहे जिस कैटेगरी से आते हों अगर उनकी पढ़ाई में रूचि हो, उनकी समझ अच्छी है और इच्छाशक्ति अच्छी है तो वे कहीं भी सफल होंगे। BPSC का कटऑफ मॉर्क्स देखकर अचंभित होने की बात नहीं है। संविधान के तहत समाज के अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के विभिन्न कैटेगरी के लोगों को विभिन्न सरकारों की ओर से विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराए जा रहे हैं, इसका रिजल्ट ही BPSC के कटऑफ में रिफ्लेक्ट हो रहा है। स्पष्ट है कि समाज के किसी भी वर्ग के लोगों को शिक्षा आदि की तमाम सहूलियत दी जाएंगी और उनमें शिक्षा के प्रति ललक होगी तो वे सफल होंगे। दिक्कत यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन सहूलियत को वोट के आधार पर लिया और दिया जाता है, ना कि जरूरत के हिसाब से। इसलिए BPSC के कटऑफ को देखकर किसी बड़े सामाजिक परिवर्तन का अनुमान करना गलत है।

क्रीमीलेयर कम करने से वास्तविक जरूरतमंदों को होगा फायदा: बैकुंठ रॉय
पटना के कॉलेज ऑफ कॉमर्स के अर्थशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर बैकुंठ रॉय ने कहा कि आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग के कटऑफ के बीच का अंतर ना केवल BPSC बल्कि दूसरे राज्यों की कंपटीशन परीक्षाओं में कम होता जा रहा है। UPSC के प्रीलिम्स एग्जाम में भी कटऑफ का अंतर कम होता जा रहा है। इतना तो कह सकते हैं कि आरक्षण की वजह से समाज में कुछ तो सकारात्मक बदलाव आया ही है। नब्बे के दशक में ओबीसी कैटेगरी के लोगों को आरक्षण के तहत फैसिलिटी मिलने से इनके समाज में भी बदलाव दिख रहा है। आरक्षण का लाभ लेकर समाज के जो लोग आगे आ रहे हैं, वह अपनी संतान और परिवार के लोगों को सुविधाएं मुहैया कराने में मददगार साबित हो रहे हैं। इसका श्रेय आरक्षण को ही जाता है।

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इसका एक पहलू ये भी है कि नब्बे के बाद देश में ग्लोबलाइजेशन, आर्थिक उदारीकरण जैसी वजहों से देश की इकोनॉमी और जीडीपी भी ग्रो कर रही है। कोरोना काल को छोड़कर इकोनॉमी बढ़ने से इसका असर समाज पर भी दिख रहा है। गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले परिवारों को भी सुविधाएं मुहैया हो पा रही है। केंद्र हो या राज्य सरकारें दोनों मनरेगा, पीएम आवास आदि योजनाएं बनाकर बजट का बड़ा हिस्सा जरूरतमंदों को लाभान्वित करने में खर्च कर रही है।

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इसमें एक बात यह भी है कि बिहार समेत देश की कुछ राज्य सरकारें समाज के कमजोर और पिछड़े तबके के लोगों को मुफ्त या बिल्कुल मामूली फीस पर कोचिंग सुविधा उपलब्ध करा रही हैं। इससे वो बच्चे जो शिक्षा का खर्च नहीं उठा पा रहे थे वे इनका सीधा लाभ ले रहे हैं। इसमें एक बात यह भी है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को लाभ मिल रहा है। यूट्यब समेत कई अन्य प्लेटफॉर्म हैं जहां मुफ्त में शिक्षा के मैटेरियल उपलब्ध हैं। पहले बिहार का छात्र अगर दिल्ली में कमीशन एग्जाम की तैयारी करने जाता था तो उसे काफी खर्च होता था, लेकिन अब वह अपने गांव में बैठकर इंटरनेट की मदद से कोचिंग कर सकता है। इसलिए कहना चाहूंगा कि कटऑफ का अंतर कम होना शोध और डिबेट का विषय है। इसका कोई एक वजह नहीं हो सकता है।

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यहां एक बात और देखने लायक है खासकर ओबीसी कैटेगरी में सोशल भेदभाव को छोड़कर क्रीमीलेयर बात करें तो इसका पैमाना कम करने की जरूरत है। क्योंकि अगर सालाना आठ लाख रुपये कमाने वाला आरक्षण कैटेगरी में आवेदन कर नौकरी की परीक्षा में बैठता है तो यह मेरे हिसाब से न्यायोचित नहीं है। क्योंकि आठ लाख कमाने वाला परिवार अपने बच्चों को शिक्षा के उत्तम संसाधन उपलब्ध कराने में सक्षम है और वह सामान्य कैटेगरी के अभ्यर्थियों से मुकाबला करने में कहीं नहीं पीछे रहेगा। ऐसे में अगर क्रीमीलेयर के स्तर को कम किया जाए तो समाज के आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिल पाएगा।

2019 में OBC का कटऑफ जनरल कैटेगरी से ज्यादा
साल 2019 में जारी हुए बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन (BPSC) की परीक्षा रिजल्ट में ओबीसी (OBC) का कट ऑफ जनरल कैटेगरी (General) से भी ऊपर गया था। बीपीएससी के फाइनल रिजल्ट में ओबीसी कैंडिडेट्स का फाइनल कट ऑफ- 595, जबकि जनरल कैटेगरी के कैंडिडेट्स का कट ऑफ 588 था। उस दौरान आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इस कट ऑफ लिस्ट को लेकर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि ये आरक्षण खत्म करने की साजिश के तहत हो रहा है। ऐसे कट ऑफ लिस्ट के जरिए आरक्षण की जरूरत नहीं होने की बात कहकर रिजर्वेशन को खत्म किया जा सकता है।
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