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पांच वर्ष जेल में बिताने के बाद दोषमुक्त आदिवासियों की बदल चुकी है दुनिया

रायपुर, 18 जुलाई (भाषा) छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में बुरकापाल नक्सली हमले में गिरफ्तार 121 आदिवासियों को अदालत ने बरी कर दिया है और उनमें से 113 ग्रामीण जेल से रिहा भी हो गए। लेकिन इन वर्षों के दौरान ग्रामीणों और उनके परिजनों ने कई चुनौतियों का सामना किया है। सुकमा जिले के जगरगुंडा गांव के निवासी हेमला आयतु उन 121 आदिवासियों में से एक है, जिन्हें 24 अप्रैल वर्ष 2017 में बुरकापाल में हुए नक्सली हमला मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल

भाषा 18 Jul 2022, 7:44 pm
रायपुर, 18 जुलाई (भाषा) छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में बुरकापाल नक्सली हमले में गिरफ्तार 121 आदिवासियों को अदालत ने बरी कर दिया है और उनमें से 113 ग्रामीण जेल से रिहा भी हो गए। लेकिन इन वर्षों के दौरान ग्रामीणों और उनके परिजनों ने कई चुनौतियों का सामना किया है।

सुकमा जिले के जगरगुंडा गांव के निवासी हेमला आयतु उन 121 आदिवासियों में से एक है, जिन्हें 24 अप्रैल वर्ष 2017 में बुरकापाल में हुए नक्सली हमला मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 25 जवान शहीद हुए थे।

आयतु लगभग पांच वर्ष से जेल में था। बीते शुक्रवार को एनआईए की विशेष अदालत ने आयतु और अन्य आदिवासियों को इस मामले से बरी कर दिया और शनिवार को वह अपने साथियों के साथ जेल से बाहर आ गए। लेकिन तब तक उसके लिए जेल से बाहर की दुनिया बदली चुकी थी।

आयतु कहते हैं, ''हमने उस अपराध के लिए पांच साल जेल में बिताए हैं, जो हमने किया ही नहीं। घटना से कुछ दिनों पहले मेरी शादी हुई थी जिसके बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मैंने तब से अपनी पत्नी को नहीं देखा है।’’

उन्होंने बताया कि उनके चाचा डोडी मंगलू (42) को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन जेल में मंगलू की मौत हो गई।

आयतु कहते हैं, ''मेरे मांगे जाने के बाद भी उन्होंने (जेल प्रशासन ने) उनसे संबंधित कोई दस्तावेज नहीं दिया है।''

यह कहानी केवल आयतु की ही नहीं है। इस मामले में गिरफ्तार बुरकापाल गांव के निवासी एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि उसके परिवार ने अदालत की सुनवाई के खर्च के लिए अपने खेत और बैल बेच दिए।

जेल से रिहा किए गए एक अन्य व्यक्ति ने कहा, ''जेल में पिछले पांच साल बहुत तकलीफों में बीता है। अब परिवार से मिलेंगे। हम तो खेती किसानी करते थे। अचानक एक दिन गिरफ्तार कर लिए गए।''

बस्तर क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने बताया कि अदालत के आदेश के बाद 113 आरोपियों को शनिवार को रिहा कर दिया गया जिनमें से 110 जगदलपुर केंद्रीय जेल और तीन दंतेवाड़ा जिला जेल में बंद थे।

सुंदरराज ने बताया कि शेष आठ अन्य मामलों में आरोपी हैं, इसलिए उन्हें रिहा नहीं किया गया है।

पुलिस अधिकारी ने बताया कि मामले में आगे की कार्रवाई के बारे में निर्णय दस्तावेज और कानूनी संभावनाओं की जांच के बाद तय किया जाएगा।

विशेष न्यायाधीश (एनआईए अधिनियम/अनुसूचित अपराध) दीपक कुमार देशलहरे की अदालत ने शुक्रवार को बुरकापाल नक्सली हमले के आरोपी आदिवासियों को दोषमुक्त कर दिया था।

अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि अभियुक्तगण के विरूध्द आरोप के संबंध में जिन साक्षियों का कथन कराया गया है उनमें से किसी के भी कथन में ऐसा कोई तथ्य विश्वास किए जाने योग्य नहीं आया है जिससे यह प्रमाणित हो कि अभियुक्तगण प्रतिबंधित नक्सली संगठन के सक्रिय सदस्य हैं तथा घटना में संलिप्त रहे हैं।

इन अभियुक्तों के पास से कोई घातक आयुध एवं आग्नेय शस्त्र की जप्ती होना भी प्रमाणित नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में इनके खिलाफ आरोपित अपराध में कोई भी आरोप प्रमाणित नहीं होना पाया गया है।

24 अप्रैल, 2017 को सुकमा जिले के बुरकापाल गांव के करीब नक्सलियों ने सीआरपीएफ के दल पर घात लगाकर हमला कर दिया था। इस घटना में 25 जवानों की मौत हो गई थी।

इस हमले मामले में चिंतागुफा और जगरगुंडा क्षेत्रों के छह गांवों से एक महिला सहित आदिवासी समुदायों के 122 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था। जिसमें एक की बाद में मृत्यु हो गई थी।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक इनमें से अधिकांश को वर्ष 2017 में गिरफ्तार किया गया था, जबकि कुछ को 2018 और 2019 में गिरफ्तार किया गया था।

इस मामले में बचाव पक्ष की अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया ने कहती हैं, ''उन्हें आखिरकार न्याय मिल गया है, लेकिन उन्होंने जो अपराध नहीं किया, उसके लिए उन्हें इतने साल जेल में क्यों बिताने पड़े? उनकी भरपाई कौन करेगा।’’

भाटिया ने कहा उनके परिवार बर्बाद हो गए हैं और अधिकांश गिरफ्तार आदिवासियों के परिजन जगदलपुर या दंतेवाड़ा जेलों में भी उनसे मिलने नहीं गए, क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे।

उन्होंने कहा कि बुरकापाल मामला बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों के साथ हुए घोर अन्याय का उदाहरण है।

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