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महाराष्ट्र के इस गांव में दादी-नानी के लिए खुला स्कूल

गुलाबी पोशाक पहने, कंधे पर बस्ता टांगे कांता मोरे हर सुबह अपने स्कूल जाती हैं और नर्सरी की उन कविताओं का अभ्यास करती हैं जिसे उन्होंने पहले सीखा था। स्कूल में दिन की शुरुआत वह अपनी क्लास के स्टूडेंट्स के साथ प्रार्थना से करती हैं और फिर अपने काले स्लेट पर चौक से मराठी में आडे तिरछे अक्षरों को लिखने की कोशिश करती हैं।

भाषा 19 Feb 2017, 4:16 pm
ठाणे
नवभारतटाइम्स.कॉम turning the hour glass grandmothers go to school
महाराष्ट्र के इस गांव में दादी-नानी के लिए खुला स्कूल

गुलाबी रंग का कपड़ा पहने, कंधे पर बस्ता टांगे कांता मोरे हर सुबह अपने स्कूल जाती हैं और नर्सरी की उन कविताओं का अभ्यास करती हैं जिसे उन्होंने पहले सीखा था। स्कूल में दिन की शुरुआत वह अपनी क्लास के स्टूडेंट्स के साथ प्रार्थना से करती हैं और फिर अपने काले स्लेट पर चौक से मराठी में आड़े तिरछे अक्षरों को लिखने की कोशिश करती हैं।

किसी प्राइमरी स्कूल में ऐसे दृश्य आम हो सकते हैं लेकिन यहां एक अंतर है - ये सभी छात्राएं 60 से 90 साल की उम्र की हैं। कांता (60) अपनी दोस्तों के साथ यहां के फांगणे गांव स्थित दादी नानियों के स्कूल 'आजीबाईची शाला' में पढ़ती हैं, जहां वे गणित, अक्षरज्ञान और उनके सही उच्चारण के साथ नर्सरी कवितओं का अभ्यास करती हैं।

45 वर्षीय योगेंद्र बांगड़ ने वक्त के पहिए को फिर से घुमाने की पहल शुरू की। स्कूल का लक्ष्य गांव की बुजुर्ग महिलाओं को शिक्षित करना है। इस गांव के अधिकांश लोगों की आजीवका का साधन खेती है। फांगणे जिला परिषद प्राथमिक स्कूल के शिक्षक बांगड़ ने मोतीराम चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिलकर इस पहल की शुरुआत की। मोतीराम चैरिटेबल ट्रस्ट इन महिलाओं को स्कूल के लिए गुलाबी साड़ी, स्कूल बैग, एक स्लेट और चॉक पेंसिल जैसे जरूरी सामान के साथ क्लास के लिए ब्लैकबोर्ड भी उपलब्ध कराता है। शुरुआत में स्कूल जाने में हिचकने वाली कांता अब मराठी में पढ़-लिख सकती हैं। वह कहती हैं कि शिक्षित जाने से वह आत्मनिर्भर महसूस कर रही हैं।

उन्होंने कहा, 'शुरुआत में मैं शर्माती और हिचकिचाती थी, लेकिन जब मैंने अपनी उम्र और उससे अधिक उम्र की महिलाओं के स्कूल में पढ़ने आने की बात जानी तो फिर मैंने भी फैसला किया। अब मैं अपनी भाषा में पढ़-लिख सकती हूं।' रोचक बात यह है कि कांता को उनकी बहू पढ़ाती हैं जो उस स्कूल में टीचर हैं।

कांता की तरह 87 साल की रामाबाई का दृढ़ निश्चय भी देखते बनता है। रामाबाई सुन नहीं पातीं, लेकिन इससे उनका उत्साह कम नहीं हुआ है। रामाबाई ने कहा, 'हम बचपन में स्कूल जाने के महत्व को नहीं जानते थे। लेकिन अब मैं लिख सकती हूं और पढ़ भी सकती हूं।'

स्कूल खोलने का विचार बांगड़ के मन में पिछले साल आया था, जब उन्होंने पाया कि गांव की सभी बुजुर्ग महिलाएं अशिक्षित थीं। उन्होंने कहा, 'मुझे लगा यह मेरी जिम्मेदारी है कि उन्हें शिक्षित करूं और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर 28 बुजुर्ग महिलाओं के साथ इस स्कूल की शुरुआत हुई।' इस ट्रस्ट को एक परिवार ने अपनी जमीन का एक हिस्सा स्कूल खोलने के लिए दिया।

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