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Arun Khetarpal 70th Birth Anniversary: 1971 युद्ध के हीरो, अकेले छुड़ा दिए थे पाकिस्तानी फौज के छक्के

Arun Khetarpal 70th Birth Anniversary: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (India-Pak War) में भारत के वीरों ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे। इस युद्ध के नायकों में एक नायक थे सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (Second Lieutenant Arun Khetrapal)। अरुण के अदम्य साहस और पराक्रम की चर्चा किए बगैर 1971 की जंग की बात करना अधूरा होगा।

नवभारतटाइम्स.कॉम 14 Oct 2020, 11:21 am
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, जिसमें बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बना, भारत के इतिहास में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस जंग में भारत के वीरों ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे। इस युद्ध के नायकों में एक नायक थे सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। अरुण के अदम्य साहस और पराक्रम की चर्चा किए बगैर 1971 की जंग की बात करना अधूरा होगा। भारत-पाकिस्तान युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए अरुण खेत्रपाल वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्हें दुश्मन के सामने बहादुरी के लिए भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र मरणोपरान्त प्रदान किया गया था। सिर्फ 21 साल की उम्र में उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया था। अरुण खेतपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) एम एल खेतरपाल भारतीय सेना में कोर ऑफ इंजीनियर्स अधिकारी थे।
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Arun Khetarpal 70th Birth Anniversary: 1971 युद्ध के हीरो, अकेले छुड़ा दिए थे पाकिस्तानी फौज के छक्के


आखिरी सांस तक पाक के टैंक उड़ाते रहे सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल

16 दिसंबर, 1971 को भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में धूल चटाई थी। युद्ध के नायकों में एक थे सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। वह पाक सेना से लोहा लेते हुए 16 दिसंबर, 1971 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। कहा जाता है कि युद्ध के दौरान सेना के अफसर अरुण वापस लौटे बोलते रहे पर वो आखिरी सांस तक पाक के टैंक उड़ाते रहे। सेकंड लेफ्टिनेंट खेत्रपाल के शौर्य और बलिदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

अरुण खेत्रपाल में स्कूली दिनों से था देश के लिए कुछ करने का जज्बा

जानकारी के मुताबिक, अरुण खेत्रपाल बढ़िया तैराक भी थे। हिंदी और वेस्टर्न म्यूजिक की भी उन्हें अच्छी समझ थी। अरुण के भाई अनुज मुकेश खेत्रपाल कहते हैं कि हमें बहुत अच्छा लगता है जब भाई के बारे में अनजान लोग भी बात करते हैं। उनमें देश के लिए कुछ करने का जज्बा स्कूली दिनों से ही था। चूंकि हमारे पिता भी सेना में थे, शायद इसलिए वे भी देश की सेना में गए।

अरुण खेत्रपाल ने जंग में तोड़ी दुश्मन की कमर

अरुण खेत्रपाल के इंडियन मिलिटरी अकैडमी (आईएमए) से निकलते ही पाकिस्तान के साथ जंग शुरू हो गई थी। अरुण ने खुद उस जंग में भाग लेने की इच्छा अपने अधिकारियों से जताई। अरुण खेत्रपाल की स्क्वॉड्रन 17 पुणे हार्स 16 दिसंबर को शकरगढ़ में थी। उस दिन भीषण युद्ध हुआ। अरुण दुश्मन के टैंकों को बर्बाद करते जा रहे थे। उनके टैंक में भी आग लग गई। वह शहीद हो गए। तब तक दुश्मन की कमर टूट चुकी थी। युद्ध में भारत को जीत मिली। दरअसल, 1971 की जंग खेत्रपाल परिवार के लिए खास थी। अरुण के पिता ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल भी उस जंग में दुशमन से लोहा ले रहे थे।

भारत-पाक युद्ध में पराक्रम दिखाते हुए शहीद हुए थे अरुण खेत्रपाल

अरुण खेत्रपाल की मां ने एक बार बताया था कि उन्हें लड़ाई में अरुण की बहादुरी के बारे में जानकारी मिल रही थी। आकाशवाणी ने 16 दिसंबर, 1971 को जंग में भारत की विजय की जानकारी देश को दी। बाकी देश की तरह खेत्रपाल परिवार भी खुश था। लेकिन तभी परिवार को पता चला कि अरुण अब कभी घर नहीं आएंगे।

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने अकेले उड़ाए थे पाक के 10 टैंक​

16 दिसंबर, 1971 को भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में धूल चटाई थी। युद्ध के नायकों में एक थे सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। अरुण के अदम्य साहस और पराक्रम की चर्चा किए बगैर 1971 की जंग की बात करना अधूरा होगा। अरुण ने लड़ाई में पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु सेना के 10 टैंक नष्ट किए थे। सिर्फ 21 साल की उम्र में उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया था।

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