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Azamgarh News: क्या पूर्वांचल में ओवैसी की राह का रोड़ा बनेगी AAP? समझिए समीकरण

एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी के बाद अब आम आदमी पार्टी ने भी यूपी विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है। ओवैसी ने ओम प्रकाश राजभर के भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल होने के फैसला लिया है। ऐसे में सवाल है कि क्या आम आदमी पार्टी ओवैसी की राह में रोड़ा बन सकती है।

Lipi 21 Dec 2020, 11:46 am
आजमगढ़
नवभारतटाइम्स.कॉम AAP AIMIM IN UP
राजभर, ओवैसी और केजरीवाल

यूपी की सत्ता की सीढ़ी कहे जाने वाले पूर्वांचल में असली घमासान 2022 में देखने को मिलेगा जब ओवैसी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक आमने-सामने होंगे। ओवैसी की पार्टी की नजर मुस्लिम ध्रुवीकरण पर है तो केजरीवाल दिल्ली माॅडल के जरिये 2014 से पूर्वांचल में स्थापति बीजेपी के वर्चस्व को तोड़ना चाहते हैं। पर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या यह उतना आसान होगा जितना ये दोनों दल समझ रहे हैं।

पूर्वांचल का मुस्लिम अब तक उसी के पक्ष में खड़ा हुआ है जो बीजेपी को हराता नजर आया है। दूसरी ओर अन्य जातियां जातिगत आधार पर बंटी हुई हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) से गठबंधन के बाद ओवैसी का दावा थोड़ा मजबूत हुआ है लेकिन आम आदमी पार्टी का अभी यहां जनाधार नहीं के बराबर है। पिछले लोकसभा चुनाव में यह स्पष्ट हो चुका है। कारण कि पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सहित कोई प्रत्याशी तीन हजार मतों का आंकड़ा नहीं छू सका था।

गौर करें तो पूर्वांचल में प्रयागराज को छोड़ दिया जाय तो सबसे ज्यादा दस विधानसभा सीट आजमगढ़ में है। आजमगढ़ में हमेशा से एसपी-बीएसपी का दबदबा रहा है। चाहे राम लहर रही हो या फिर मोदी लहर बीजेपी यहां कभी अच्छा नहीं कर पाई है। वर्तमान में पांच विधानसभा सीट एसपी, चार बीएसपी और एक बीजेपी के पास है।

पड़ोसी जिलों की बात करें तो इनमें वर्ष 2014 के बाद से ही बीजेपी का वर्चस्व कायम है। मऊ की चार विधानसभा सीटों में से तीन पर बीजेपी का कब्जा है। एक सीट से मुख्तार अंसाारी बीएसपी विधायक हैं। इसी तरह बलिया की 7 सीटों में से एक एसपी, एक बीएसपी के पास है। बाकी पांच पर बीजेपी का कब्जा है। जौनपुर की सात विधानसभा सीटों में पांच पर बीजेपी और एक पर उसकी सहयोगी अपना दल का कब्जा है, जबकि एक सीट बीएसपी और दो सीट एसपी के पास है। इसी तरह गाजीपुर की सात सीटों में तीन पर बीजेपी, दो पर उसकी पूर्व सहयोगी एसबीएसपी और 2 पर बीएसपी का कब्जा है।

पूर्वांचल पर ओवैसी की नजर लंबे समय से है। एसपी सरकार के दौरान आजमगढ़ और आसपास के जिलों में ओवैसी ने अपनी पैठ बनाने की भरपूर कोशिश की लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्हें आजमगढ़ आने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद भी अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में उनकी गहरी पैठ है। एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत माहुली भी इसी जिले के हैं। बिहार में मिली पांच विधानसभा सीटों पर जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओें का मनोबल बढ़ा है। ओवैसी के यूपी चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से ही पूरे पूर्वांचल में संगठन विस्तार की कोशिश हो रही है। वहीं ओवैसी ने एसबीएसपी से गठबंधन कर पूर्वांचल के करीब 8 प्रतिशत राजभरों को भी पाले में करने का दांव चल दिया है।

दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी भी यूपी चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। इस दल ने पिछला लोकसभा चुनाव भी लड़ा था लेकिन एसी-बीएसपी गठबंधन और मोदी लहर में वह कोई करिश्मा नहीं कर सकी थी। पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेश यादव उस समय आजमगढ़ सीट से एसपी मुखिया अखिलेश यादव के खिलाफ मैदान में उतरे थे लेकिन वे तीन हजार मतों का आंकड़ा नहीं छू सके थे। लालगंज प्रत्याशी और घोसी प्रत्याशी का हाल और भी बुरा था। ऐसे में केजरीवाल की पार्टी के लिए चुनौतियां कम नहीं दिख रही हैं।

खास बात है कि ओवैसी हो या आम आदमी पार्टी, इन्हें पूर्वांचल में सिर्फ बीजेपी की चुनौती का सामना नहीं करना है बल्कि एसपी-बीएसपी भी इनके राह में रोड़ा बनेंगे। कारण कि यह क्षेत्र तीन दशक तक इन दलों का गढ़ रहा है। आज भी यादव मतदाता पूरी ताकत के साथ एसपी और दलित (जाटव) बीएसपी के साथ खड़ा है। वर्ष 2014 से अब तक यहां का अति पिछड़ा और अति दलित बीजेपी के प्रति गोलबंद है। जिसका फायदा पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिल रहा है। यहां आम आदमी पार्टी या एआईएमआईएम को कोई करिश्मा करना है तो जातीय ध्रुवीकरण को तोड़ना होगा जो इतना आसान नहीं है।

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