ऐपशहर

839 सालों से चले आ रहे ऐतिहासिक कजली मेला पर संशय, आल्हा-ऊदल से है खास नाता

बुंदेलखंड के ऐतिहासिक कजली मेला के आयोजन को लेकर संशय बरकरार। एक पखवाडे़ से कम समय शेष आयोजन को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। कोरोना की तीसरी लहर के मद्देनजर प्रशासन ने हरी झंडी नहीं दी है।

Edited byविवेक मिश्रा | Lipi 8 Aug 2021, 4:37 pm
राकेश कुमार अग्रवाल, महोबा
नवभारतटाइम्स.कॉम afp_1502517218

महोबा में 839 सालों से अनवरत चले आ रहे ऐतिहासिक कजली मेला के आयोजन को लेकर कोरोना के कारण फिर से संशय बरकरार है। जिला प्रशासन ने मेले के आयोजन को अभी तक हरी झंडी नहीं दी है, जबकि आयोजन को लेकर महज एक पखवाडे़ का वक्त बचा है

यूपी एमपी के लोगों को बेसब्री से रहता है इंतजार
कजली मेले को देखने के लिए उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सभी जिलों के लोग आते हैं। इस कारण मेले में भारी भीड़ उमड़ती है। भीड़ में सोशल डिस्टेंसिंग को बनाए रखना सम्भव नही है। कोरोना की तीसरी लहर का अंदेशा भी है, इसलिए प्रशासन भी फूंक-फूंककर कदम रख रहा है, ताकि बाद में कोई अप्रिय स्थितियां पैदा न हो जाएं।

क्यों मनाया जाता है कजली मेला
लगभग 839 वर्ष पहले 1182 में उस समय महोबा के राजा परमाल थे। उनकी बेटी चंद्रावल 1400 सखियों के साथ भुजरियों के विसर्जन के लिए कीरतसागर जा रही थीं। रास्ते में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडा राय ने आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण का मकसद चंद्रावल को पाकर उसकी शादी अपने बेटे सूरज सिंह से कराने, पारस पत्थर और नौलखा हार को अपने कब्जे में लेने की थी।

सेनापतियों और वीर योद्धा आल्हा ऊदल को राजा परमाल ने महोबा से निष्कासित कर दिया था। दोनों सेनाओं के बीच कीरतसागर तट पर हुए युद्ध में राजकुमार अभई मारा गया था। जब इसकी भनक आल्हा-ऊदल को लगी तो वे साधु के रूप में महोबा पहुंचे और पृथ्वीराज चौहान की सेना को धूल चटाई। युद्ध के कारण राजकुमारी चंद्रावल और उनकी सखियों ने अगले दिन भुजरियों को विसर्जित किया, तब से महोबा में कजली मेला रक्षाबंधन पर्व के अगले दिन मनाया जाता है। इस अवसर पर कीरतसागर तट पर हर साल मेला लगता है।

बजरंग पूनिया ने 2018 में गोरखपुर से किया था वादा...ओलंपिक में किया पूरा तो झूम उठे खिलाड़ी
नगरपालिका आयोजित कराती है मेला
कजली मेला का आयोजन नगर पालिका परिषद कराती है। मेले में रोजाना शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी, गोष्ठी के अलावा मनोरंजन और खरीदारी के लिए दूरदराज से दुकानें आती हैं। जिसमें बडी संख्या में लोग उमड़ते हैं। मेले की शुरुआत भव्य शोभायात्रा से होती है। पहली बार परम्परा गत वर्ष टूटी थी, जब कोरोना के चलते कजली मेला नहीं आयोजित हुआ था। इस वर्ष भी अभी तक मेले को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है।
लेखक के बारे में
विवेक मिश्रा
जन्मस्थली बाराबंकी है और कर्मस्थली तीन राज्य के कई शहर रहे हैं। 2013 में प्रिंट मीडिया से करियर की शुरुआत की। मप्र जनसंदेश, पत्रिका, हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक जागरण होते हुए नवभारत टाइम्स के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा।... और पढ़ें

अगला लेख

Stateकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर
ट्रेंडिंग