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फौज की नौकरी छोड़ खेतों में लहलहायी उम्मीदों की फसलें... संतरा, चीकू और अंजीर अब बेचने की तैयारी

किसान ने बताया कि एक पेड़ में एक हजार फल लगते हैं। वर्ष 1980 में फौज में नौकरी मिली थी। प्रशिक्षण के लिए सहारनपुर बुलवाया गया था। वहां प्रशिक्षण लेने के बाद सेना में सैनिक बनने का मौका मिला, लेकिन घर और परिवार की चिंता ने उन्हें नौकरी छोडने पर मजबूर कर दिया।

Lipi 12 May 2021, 12:02 pm
पंकज मिश्रा, हमीरपुर
नवभारतटाइम्स.कॉम harvesting hopeful crops in fields leaving armys job
फौज की नौकरी छोड़ खेतों में लहलहायी उम्मीदों की फसलें... संतरा, चीकू और अंजीर अब बेचने की तैयारी

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एक किसान ने पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में बागवानी कर उम्मीदों की फसलें तैयार की हैं। मौसमी, संतरा, अंजीर, लीची, चीकू के अलावा खेत में आम के फल भी बेचने की तैयारी की है। कोरोना संक्रमण काल में ही इसे एक लाख रुपये का मुनाफा हुआ है। किसान ने फौज की नौकरी भी कुछ समय तक की थी।

हमीरपुर जिले के गोहांड ब्लाक के बिंगवा गांव निवासी महिपाल सिंह ने पांच हेक्टेयर भूमि पर बागवानी की है। खेत में मौसमी, संतरा, चीकू, अंजीर, लीची और आम के सैकड़ों पौधे भी इन दिनों तैयार हैं। फल भी आ गए हैं। पिछले साल कोरोना संक्रमण काल में इसने अमरूद, मौसमी और अन्य फलों की बागवानी से डेढ़ लाख रुपये की पूंजी बनायी थी और अब फिर से इन फसलों को खरीदने के लिए उससे लोग व्यवसायी सम्पर्क कर रहे हैं। किसान ने हाल में ही आम के फलों के लिए बीस हजार रुपये का आर्डर मिला है।

किसान ने बताया कि एक पेड़ में एक हजार फल लगते हैं। वर्ष 1980 में फौज में नौकरी मिली थी। प्रशिक्षण के लिए सहारनपुर बुलवाया गया था। वहां प्रशिक्षण लेने के बाद सेना में सैनिक बनने का मौका मिला, लेकिन घर और परिवार की चिंता ने उन्हें नौकरी छोडने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद महिपाल ने बागवानी के साथ परम्परागत खेती शुरू की। आज उसके घर में खुशहाली है।

सिंदूर के भी पौधे किए तैयार, बेचने के लिए नहीं मिला प्लेटफार्म
महिपाल ने बताया कि आठ साल पहले भोपाल में सरकारी अनुसंधान में एक कार्यक्रम के दौरान सिन्दूर के पौधे देखकर इसे खेत में रोपित करने का फैसला लिया था। वहां से कुछ हजार रुपये में सिन्दूर के पौधे लगाये और इसे अपने खेत में रोपित कर दिया था। मौजूदा में सिन्दूर का पेड़ बड़ा हो गया है। इसमें सिन्दूर भी मिलने लगा है। सिन्दूर के पौधों में हर साल फल लगते हैं, जिससे आमदनी भी हर साल दोगुनी होती है, लेकिन इसे बेचने के लिये कोई प्लेटफार्म नहीं मिल रहा है।

बताया कि गांव और पूजन सामग्री में सिन्दूर मुफ्त दिया जाता है। उसका कहना है कि ये सिन्दूर माथे पर लगाने से मन को बड़ी शांति मिलती है। क्योंकि इस सिन्दूर में कोई केमिकल नहीं होता है। राजकीय कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डा.एसपी सोनकर ने बताया कि जिले में महिपाल के अलावा अन्य किसान भी परम्परागत खेती के साथ बागवानी कर आत्मनिर्भरता का संदेश दिया है। बताया कि बागवानी से ही किसान आर्थिक रूप से मजबूत हो सकता है।

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