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उत्तराखंड निकाय चुनावों में हारः दो खेमों में बंटी कांग्रेस, एक दूसरे पर मढ़ रहे दोष

उत्तराखंड में हुए निकाय चुनाव में जीत की आश्वस्त कांग्रेस को करारी हाल मिली। इस बार के बाद अब पार्टी के दो खेमों में आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि निकाय चुनावों के लिये प्रचार से उन्हें ज्यादातर दूर ही रखा गया

भाषा 25 Nov 2018, 2:56 pm
देहरादून
नवभारतटाइम्स.कॉम सांकेतिक चित्र
सांकेतिक चित्र

हाल ही में उत्तराखंड में संपन्न नगर निकाय चुनावों में केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ माहौल को अपने पक्ष में भुना पाने की विफलता के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में बेचैनी बढ़ गयी है। कांग्रेस अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले इन चुनावों के जरिये अपने लिये संजीवनी ढूंढ रही थी। दो खेमों में बंटी कांग्रेस में हार का दोष अब एक दूसरे पर मढ़ने के लिये आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने परोक्ष रूप से हार का ठीकरा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह पर फोड़ दिया।

पूर्व सीएम बोले प्रचार से रखा गया दूर
पूर्व मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि निकाय चुनावों के लिये प्रचार से उन्हें ज्यादातर दूर ही रखा गया, लेकिन जहां-जहां उन्होंने प्रचार किया, वहां ज्यादातर जगहों से कांग्रेस उम्मीदवार विजयी रहे। दूसरी तरफ, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सिंह ने सफाई दी कि रावत की व्यस्तता के कारण राज्य में उनके ज्यादा कार्यक्रम तय नहीं किये जा सके। सिंह ने यह भी कहा कि अगर पार्टी के कुछ नेता इस हार का ठीकरा उनके सिर पर फोड़ना चाहते हैं तो वह यह जिम्मेदारी लेने के लिये तैयार हैं। उन्होंने कहा, 'निकाय चुनाव नतीजों के मंथन में अगर मेरे हिस्से जहर आया तो मैं यह जहर पीने को तैयार हूं ।'

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का आरोप
गौरतलब है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और हल्द्वानी की विधायक इंदिरा ह्रदयेश के पुत्र सुमित की हल्द्वानी मेयर पद पर मिली शिकस्त भी पार्टी के भीतर एक बड़ा मुद्दा बन गयी है । रावत ने स्वयं को हल्द्वानी से परे रखा और कहा कि उन्हें वहां प्रचार न कर पाने का मलाल रह गया । पुत्र की हार के बारे में इंदिरा का कहना है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी की गयी और कई लोगों के नाम सूची से हटा दिये गये। उनका कहना है कि जिनके नाम हटाए गए उनमें से ज्यादातर लोग कांग्रेस समर्थक थे जिसका नुकसान उनके पुत्र को उठाना पड़ा। इंदिरा का यह भी मानना है कि हल्द्वानी में अधिकतर पार्षदों को पार्टी के चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ाने के फैसले का खामियाजा भी सुमित को भुगतना पड़ा। उन्होंने कहा कि पार्षदों ने अपने लिये तो वोट मांगे लेकिन मेयर पद के प्रत्याशी रहे सुमित के लिये उन्होंने वोट नहीं मांगे, जिसकी वजह से कई जगह कांग्रेस के पार्षदों और मेयर को पडे़ वोटों में भारी अंतर देखा गया।

पार्टी सूत्रों का मानना है कि रावत देहरादून और हल्द्वानी जैसे बडे़ शहरों से दूरी बनाये रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कुछ नेताओं को उनका वहां जाना पसंद नहीं आता और वे असहज हो जाते हैं। प्रदेश में 18 नवंबर को हुए नगर निकाय चुनावों में सत्ताधारी बीजेपी ने कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए राजधानी देहरादून के मेयर पद सहित 34 निकायों के अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। कांग्रेस को 25 निकाय अध्यक्ष पदों पर विजय मिली जबकि निर्दलीय प्रत्याशियों ने 23 निकाय अध्यक्ष पदों पर कब्जा कर दोनों प्रमुख दलों को स्तब्ध कर दिया। प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने इस संबंध में कहा कि टिकट वितरण के लिये पार्टी में व्यापक विचार विमर्श किया गया था। धस्माना ने कहा कि पार्टी में व्यापक रूप से विचार विमर्श के बाद निर्णय लिये गये और हमारा मानना है कि हमारा प्रदर्शन भी बेहतर ही रहा।

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