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तालिबानी 'भस्‍मासुर' का असर, इस्‍लामिक कट्टरता की ओर बढ़ रहा पाकिस्‍तान, सुन्‍नी हिंसा का खतरा

Pakistan Islamization Taliban Victory: अफगानिस्‍तान में तालिबान राज आने से पाकिस्‍तान में मुस्लिम कट्टरपंथी गुटों को नई ऊर्जा मिलती दिख रही है। इससे देश में सुन्‍नी गुटों के अल्‍पसंख्‍यकों और शियाओं पर हमले का खतरा बढ़ता जा रहा है।

Curated byशैलेश कुमार शुक्ला | नवभारतटाइम्स.कॉम 17 Sep 2021, 10:11 am

हाइलाइट्स

  • साल 1996 में अफगानिस्‍तान में तालिबान राज आने के बाद इस्‍लामिक गुटों को नई ऊर्जा मिली
  • हालांकि तालिबानी कट्टरता का जिस देश पर सबसे ज्‍यादा असर पड़ा था, वह पड़ोसी पाकिस्‍तान
  • तालिबान की जीत को उस समय पाकिस्‍तान के आतंकी गुटों के 'शिष्‍यों' की जीत माना गया था
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तालिबान राज आने से पाकिस्‍तान में कट्टरपंथी गुट सक्रिय
इस्‍लामाबाद
साल 1996 में अफगानिस्‍तान में तालिबान राज आने के बाद दुनियाभर के कट्टर इस्‍लामिक गुटों को नई ऊर्जा मिल गई थी। हालांकि तालिबानी कट्टरता का जिस देश पर सबसे ज्‍यादा असर पड़ा था, वह पड़ोसी पाकिस्‍तान था। तालिबान की जीत को उस समय पाकिस्‍तान के आतंकी गुटों के 'शिष्‍यों' की जीत माना गया था। यही नहीं दक्षिण एशिया के कई लोगों ने माना था कि यह अल्‍लाह का संकेत है। अफगानिस्‍तान में तालिबान राज आते ही एक बार फिर से पाकिस्‍तान के इस्‍लामिक कट्टरता की ओर बढ़ने का खतरा मंडराने लगा है।
वर्ष 1996 में पाकिस्‍तान के मुख्‍यधारा के राजनीतिक दलों से परेशान जनता ने अफगानिस्‍तान में तालिबान राज आने के बाद अपने देश में भी शरिया कानून और तालिबान के स्‍टाइल में सरकार बनाने की मांग शुरू कर दी थी। तालिबान के आने के बाद पाकिस्‍तान में वहाबी इस्‍लाम काफी लोकप्रिय हो गया था जो इस्‍लाम का कट्टरवादी स्‍वरूप है। उस समय भी विशेषज्ञों का कहना था कि पाकिस्‍तानी सेना ने तालिबान का समर्थन किया था और इसी वजह से तालिबान की लोकप्रियता पाकिस्‍तान में भी बढ़ गई।
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तालिबानी भस्‍मासुर की जीत का असर पाकिस्‍तान पर पड़ना तय
करीब 20 साल तक जंग लड़ने के बाद अमेरिकी सेनाएं वापस जा चुकी हैं और तालिबानी आतंकी एक बार फिर से अफगानिस्‍तान में सत्‍ता में आ गए हैं। इस बीच विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबानी भस्‍मासुर की जीत का असर पाकिस्‍तान पर एक बार फिर से पड़ना तय है। लाहौर के रहने वाले राजनीतिक विश्‍लेषक अहसान राजा ने डीडब्‍ल्‍यू से कहा कि पाकिस्‍तानी शासन और सुन्‍नी अतिवादी अभी तालिबान का समर्थन कर रहे हैं। इससे पाकिस्‍तान के अंदर अलगाववादी तनाव बढ़ सकता है।

अहसान राजा की यह आशंका निर्मूल नहीं है। तालिबान का जब पहले शासन आया था तब पाकिस्‍तान में अचानक से जिहादी गुटों और धार्मिक मदरसों की बाढ़ आ गई थी। अलगाववादी हिंसा तेजी से बढ़ गई थी। इस दौरान सुन्‍नी संगठन शिया और अन्‍य अल्‍पसंख्‍यकों को निशाना बनाने लगे थे। राजा ने कहा कि यह तनाव आने वाले समय में फिर से बढ़ सकता है। उन्‍होंने कहा, 'अपने वैचारिक भाइयों की अफगानिस्‍तान में सफलता से उन्‍हें फिर से बढ़ावा मिल गया है।'
लेखक के बारे में
शैलेश कुमार शुक्ला
शैलेश कुमार शुक्‍ला, पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से ताल्‍लुक रखते हैं। उन्‍होंने इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय और माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई की। अमर उजाला से पत्रकारिता की शुरुआत की। वार्ता, पीटीआई भाषा, अमर उजाला, नवभारत टाइम्‍स ऑनलाइन में करीब 14 साल काम का अनुभव है। इंटरनैशनल डेस्‍क पर कार्यरत हैं। राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय राजनीति, विज्ञान, रक्षा, पर्यावरण जैसे विषयों के बारे में जानने और लिखने की हमेशा ललक रही है।... और पढ़ें

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